Thursday, October 15, 2026

काम्यकेश्वर तीर्थ पर 18 अक्टूबर रविवार को मनेगा महा सप्तमी पर्व, अखंड भंडारे का होगा आयोजन


मंदिर में रंगाई-पुताई और घाटों की साफ-सफाई का कार्य जारी, सुबह 11 बजे होगी हवन की पूर्णाहुति
राजेश वर्मा। भारत न्यूज 24
कुरुक्षेत्र, 15 अक्टूबर :
कुरुक्षेत्र के गांव कमौदा स्थित काम्यकेश्वर तीर्थ पर रविवार, 18 अक्टूबर को महा सप्तमी पर्व मनाया जाएगा। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की रविवार सप्तमी के अवसर पर आयोजित होने वाले इस धार्मिक कार्यक्रम को लेकर तीर्थ परिसर में तैयारियां की जा रही हैं। मंदिर की रंगाई-पुताई, घाटों की साफ-सफाई और परिसर को रंग-बिरंगी रोशनी से सजाने का कार्य जारी है। पर्व के अवसर पर हवन-पूजन, धार्मिक अनुष्ठान और अखंड भंडारे का आयोजन किया जाएगा। हवन की पूर्णाहुति सुबह 11 बजे होगी।

आयोजन ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी जी के सान्निध्य में संपन्न होगा। आयोजकों की ओर से श्रद्धालुओं के लिए विशाल भंडारे की व्यवस्था की गई है। पर्व को लेकर क्षेत्र के श्रद्धालुओं में एक विशेष उत्साह देखा जा रहा है। आयोजकों ने धर्मप्रेमियों और क्षेत्रवासियों से इस कार्यक्रम में शामिल होकर पूजा-अर्चना करने की अपील की है।

मां कालरात्रि की पूजा का विशेष महत्व

अनुज अत्रि ने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की रविवार सप्तमी को महा सप्तमी के रूप में मनाया जाता है। नवरात्र के अवसर पर इस तिथि का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। मान्यता के अनुसार पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में मां कालरात्रि की पूजा का विधान है। इस दिन व्रत रखने, तीर्थ स्नान करने, दान देने और पूजा-अर्चना करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। धार्मिक विश्वास के अनुसार, महा सप्तमी का व्रत संतान सुख और परिवार की खुशहाली से भी जुड़ा है। श्रद्धालु भगवान शिव और मां दुर्गा की आराधना कर परिवार की सुख-समृद्धि और आरोग्य की कामना करते हैं।

महाभारतकालीन मान्यताओं से जुड़ा है तीर्थ

काम्यकेश्वर तीर्थ का संबंध महाभारतकालीन धार्मिक परंपराओं से माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पांडवों ने वनवास के दौरान काम्यकवन को अपनी तपोस्थली बनाया था। इस क्षेत्र में उन्होंने तपस्या और धार्मिक साधना की। धार्मिक कथाओं में भीष्म पितामह द्वारा युधिष्ठिर को धर्म का उपदेश देते समय इस स्थान की महत्ता का वर्णन किए जाने का उल्लेख मिलता है।

मान्यता है कि इस क्षेत्र में लंबे समय तक यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठान होते रहे। नैमिषारण्य सहित विभिन्न क्षेत्रों से ब्राह्मणों और ऋषि-मुनियों के यहां पहुंचने की कथाएं भी प्रचलित हैं। बारह वर्षों तक चले यज्ञ से जुड़ी मान्यता के कारण इस तीर्थ का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है।

भगवान श्रीकृष्ण के आगमन की भी मान्यता

पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ इस पवित्र स्थल पर तीन बार आए थे। मान्यता है कि उन्होंने अलग-अलग अवसरों पर पांडवों को सांत्वना दी और धर्म का उपदेश दिया। इन कथाओं में पांडवों के वनवास, दुर्वासा ऋषि से जुड़े प्रसंग और द्रौपदी के हरण के बाद पांडवों को सांत्वना देने की घटनाओं का उल्लेख मिलता है।

धार्मिक परंपरा के अनुसार, सूर्यदेव से प्राप्त अक्षय पात्र के माध्यम से द्रौपदी यहां रहने वाले तपस्वियों के भोजन की व्यवस्था करती थीं। क्षेत्र में मेले और भंडारे की परंपरा को भी स्थानीय धार्मिक आस्था से जोड़कर देखा जाता है।

महा सप्तमी के अवसर पर आयोजित होने वाले कार्यक्रम में श्रद्धालु हवन-पूजन, तीर्थ स्नान और दान-पुण्य में भाग लेंगे। आयोजकों ने श्रद्धालुओं से निर्धारित तिथि पर तीर्थ पहुंचकर धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल होने और भंडारे में सहभागिता करने का आह्वान किया है।

काम्यकेश्वर तीर्थ पर 18 अक्टूबर रविवार को मनेगा महा सप्तमी पर्व, अखंड भंडारे का होगा आयोजन

मंदिर में रंगाई-पुताई और घाटों की साफ-सफाई का कार्य जारी, सुबह 11 बजे होगी हवन की पूर्णाहुति राजेश वर्मा। भारत न्यूज 24 कुरुक्षे...